प्रकृति और सांस्कृति का अटूट संगम – हमारा झारखंड
बीते दिनों नवादा जिले से कोडरमा घाटी की यात्रा कर रही थी, प्यारी सी हवा चेहरे को छुई जा रही थी. हाईवे से अलग होकर सड़कें सरकरी हो गई, गाड़ी की गति धीमी और धूप जंगल की चादर को चीर नहीं पा रही थी. दूर-दूर तक घने जंगल और पेड़ के पत्तों पर चमक, पक्षियों की सरसराहट, मुंह से निकल गया - यही तो है हमारा झारखंड. झाड़ियां के प्रदेश से विख्यात झारखंड प्राचीन काल से ही प्रकृति की गोद में रहा है. यहां की लकड़ी, लौह, जानवर इत्यादि मौर्य - नंद इत्यादि मगध राजवंशों के राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ को पूरा करते थे.
झारखंड के प्रकृति को सहेज के रखती है उसकी संस्कृति. यहां प्रकृति और संस्कृति दोनों इतनी गहराई से एक दूसरे से जुड़ी हुईं हैं कि दोनों को अलग करके समझा नहीं जा सकता . यहां की नदियां, वन , पहाड़ , झरने केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं है बल्कि लोगों की जीवनशैली, परंपरा और अटूट आस्था का केंद्र है. यहां के जल-जंगल-जमीन आदिवासी समुदाय की आत्मा है, जिन्होंने सदियों से प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर रखे हुए हैं.
पर्यावरण को नया रूप देते हैं झारखंड के त्योहार- टुसू परब के साथ फसल कटाई और फगुआ के साथ ढोल - मांदर से ॠतु परिवर्तन का स्वागत किया जाता है. सरहुल "साल" वृक्ष के फूल खिलने से मनाया जाने वाला पर्व है. सरहुल में सृष्टि की पूजा की जाती है और पर्यावरण और जीवन की प्रति आभार प्रकट किया जाता है। भाई - बहन के प्रेम से बंधी कर्मा पूजा में 'करम' वृक्ष की पूजा की जाती है जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है. फसल कटाई और पशुओं के सम्मान का समय लेकर आता है सोहराय, जो पृथ्वी और पशुओं के प्रति आभार प्रकट करता है. खास बात यह है कि इन त्योहारों में किसी प्रकार के प्लास्टिक रासायनिक रंग या प्रदूषण कार्य तत्वों का उपयोग नहीं होता है. सब कुछ प्राकृतिक, स्थानीय और सामुदायिक रूप से साझा किए जाते हैं.
प्रकृति को संजोय रखते हैं यहां के 'सरना' अर्थात ‘सेक्रेड ग्रोव्स!’ जहां आदिवासी समुदाय किसी खास पेड़, झरने या जंगल के हिस्सों को देवी-देवता का निवास मानते हैं. वहां पेड़ काटना, शिकार करना या प्रदूषण फैलाना सख्त मना होता है. इसी आस्था और विश्वास के कारण सदियों से यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से संरक्षित है.
पर्यावरण का उल्लेख में सारण्डा का जिक्र ना हो, यह झारखंड के प्रकृति की तौहीन होगी. सारंडा झारखंड का फेफड़ा है. यह न सिर्फ ऑक्सीजन का विशाल स्रोत है बल्कि जलवायु संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है. वहीं "छोटानागपुर की रानी" में दर्जनों झरने हैं, पानी की गड़गड़ाहट सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाता है मानो आत्मा पवित्र हो गई हो. प्रकृति की गोद में दलमा पहाड़ियों में हाथी दिख जाए तो क्या ही बात है. पलामू टाइगर रिजर्व में रोज हजारों लोग बाग के एक दर्शन के लिए आतुर रहते हैं. पतरातू, दामोदर, मयूराक्षी की घाटियां फिल्मों में दर्शय गए जैसे रहते हैं. नदियों, हरियाली, खेतों और जलधाराओं के किनारे बसे यह क्षेत्र सांस्कृतिक और जीवन के बीच संतुलन को दिखाते हैं.
प्रकृति ने झारखंड को खनिज संपदा से भी भर दिया है. झारखंड के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 40% हिस्सा खनिजों से समृद्ध है जो संपूर्ण भारत के विकास में काम आ रहा है. हालांकि अंधाधुंध खनन ने जंगलों और पहाड़ों को खोखला कर दिया है. सिंहभूम, धनबाद और बोकारो जैसे क्षेत्र, जहां कभी घने साल के जंगल थे, अब धूल और मशीनों की आवाज से भर गए हैं.
औद्योगिकरण, व्यवसायीकरण और शहरीकरण ने प्रकृति को उपभोग की वस्तु बना दिया है. आदिवासी अपने जल-जंगल- जमीन से वंचित हो रहे हैं. शहरों का फैलाव ज़मीनों और जंगलों सको निगलते जा रहा है. इन तीनों ने मिलकर झारखंड के प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक नैसर्गीकता को कमजोर कर दिया है. अब चुनौती यही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जाए ताकि झारखंड की प्रगति उसकी प्रकृति की कीमत पर ना हो. बल्कि उसी के सहारे टिकाऊ रूप से आगे बढ़े और हमारा झारखंड प्रकृति की गोद में सदैव खेलता रहे.
Very well crafted about the beauty of Jharkhand. Happy Silver Jubilee, Jharkhand. "Hai re hamar Sona Jharkhand".
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