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Showing posts from March, 2026

The Art of Ignorance

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  Recently I started to breathe...nhi mai saans pehle bhi le rahi thi....par jobless aur " kunwari tezi se budhi hoti huyi ladki ko settle karo ", " Abhi tak clear nhi hua?" "Nukari nhi chhodni chahiye thi!" wale taano ne suffocate kar rakha tha!  But by the grace of God, sorry, by the grace of government, I secured a job which made me a little mentally stable to absorb all the taunts of society. Taunts ab bhi hain....par level badal gaya hai. Now people taunt me .... that " Rank thoda aur achha rehta toh promotion achhi jaldi hoti; cdpo hi toh hai....kaun sa upsc clear ki hai....; Itni  hi tez thi toh yahi exam clear kar payi....tyaari toh upsc ki kar rahi thi. .."  Kuch over-concerned relatives ke sujhav bhi mil rahe ki " aur aage jaana hai "....iss baat se jo pressure create hota hai mere "komal mann" par shayad hi unko maloom ho!  Kuch relatives ke mumma papa ko taunt-calls bhi aane band ho gaye;  Ab vo khud apne issues pa...

Eletter 10- युद्ध और मानवता

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  मध्य एशिया में दिनोंदिन बढ़ती युद्ध के हालात के कारण तबाही मानवता की हो रही है। इससे ना सिर्फ तेल के दाम में वृद्धि हो रही है, बल्कि बच्चे, महिलाएँ, आम जन पर भी असर हो रहा है। दिव्तीय विश्व युद्ध से शायद हमने कुछ नहीं सीखा, शायद इसलिए भयानक मिसाइल से देश आपस में लड रहे हैं। यह शताब्दी हमें जलवायु परिवर्तन से लड़‌ना चाहिए था तो हम युद्ध से आर्थिक तबाही की ओर अग्रसर हो रहे हैं। आज ज़रूरत है तो संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य देशों की हस्तक्षेप की ताकि युद्ध रोक सके और तबाही होने से बचा सके।

Eletter 09 - मोबाइल फोन की अनियंत्रित उप‌योग की रोकथाम

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  किशोरों में बढ़ते अवसाद को रचनात्मक ढंग से रोकने की ज़रूरत है. पहला, माता-पिता, भाई-बहन से संवाद बढायें. बच्चे मोबाइल फोन का उपयोग इसलिए ही करते हैं, क्योंकि संवाद से वे कट जाते हैं; माता पिता से भावनात्मक दूरी बढ़ जाती है. उन्हें बात-बात पर डॉट - फटकार किया जाता है. शाबाशी की जगह तानों का भी डर होता है; इसलिए जरूरी है कि अभिभावक दोस्त बन कर बिना तुलना किये बच्चों के साथ वक्त बितायें. बच्चों की पसंद- नापसंद समझें और उन्हें स्वीकार करें. बच्चों को खाली समय में पार्क, धार्मिक स्थल सैर कराने ले जाए. इससे बच्चे मोबाइल की दुनिया से ख़ुद ही बाहर निकले पाएँगे ।

Eletter 08 - अभिभावक बच्चों की हमेशा आलोचना न करें:-

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  हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है कि जो अभिभावक बच्चों पर अत्यधिक दबाव और पाबंदी बनाकर रखते हैं, उनके बच्चों में विचार-शक्ति कम हो जाती है और उनका आत्मविश्वास घटने लगता है. किशोरावस्था में वे आक्रामक भी हो जाते हैं और अभिभावकों से दूरी बना लेते हैं. वे अपने माता-पिता से छोटी-छोटी बातें भी साझा करने से डरने लगते हैं. अतः अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को समझें, उनसे बातें साझा करें और किसी भी बात पर हमेशा उनकी आलोचना न करें. उनका मनोबल बढ़ाएँ और उनका विश्वास जीतें, तभी एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढा जा सकता है. 

Eletter 07 - रिश्तों का व्यापार

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  व्यवसायीकरण और औद्योगीकरण ने समाज की सोच और मूल्यों को गहराई से प्रभावित किया है। आज आर्थिक स्थिति व्यक्ति की पहचान का प्रमुख आधार बन चुकी है। रिश्ते, विवाह और सामाजिक सम्मान भी अब आर्थिक सामर्थ्य के आधार पर तय होते हैं। इससे मानवीय संवेदनाएँ और सहानुभूति पीछे छूटती जा रही हैं। व्यवसायीकरण ने जहाँ जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं संबंधों को औपचारिक और स्वार्थपूर्ण भी किया है। सच्चा विकास तभी संभव है जब आर्थिक प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों का भी संरक्षण हो। 

Eletter 06- राज्य में प्रतियोगी परिक्षाओं की विडंबना

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  कहते हैं, समय सबसे मूल्यवान होता है। परंतु हमारे राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं में न तो परीक्षाएं समय पर होती हैं, न ही उनका परिणाम निर्धारित कैलेंडर के अनुसार आता है। साल-दर-साल बीत जाते हैं, लेकिन परिणाम का कोई संकेत नहीं मिलता। इससे न केवल सरकार की लापरवाही उजागर होती है, बल्कि विद्यार्थियों का अनमोल समय भी व्यर्थ चला जाता है। सरकार को चाहिए कि वह अपने तय समय-सारणी के अनुसार परीक्षाओं का आयोजन सुनिश्चित करे, ताकि युवाओं का समय और विश्वास दोनों सुरक्षित रहें। तभी सच्चे अर्थों में राज्य का  विकास संभव होगा; अन्यथा पूरा युवा समाज अंधकार में भटकता रहेगा।

Eletter 05 - आधुनिक युग में शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों की चुनौतियां.

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शिक्षक समाज के वह नींव होते हैं जिन पर बच्चों का व्यक्तित्व एवं आचरण निर्भर करता है। वे हमें किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। एक अच्छा शिक्षक समाज के कल्याण में विशेष भूमिका निभाता है, परंतु आज गूगल बाबा और chatgpt के दौर में विद्यार्थी शिक्षक के संबंध की नींव हिल चुकी है। विद्यार्थी अपने शिक्षकों को कमतर आँकते हैं और उनका सम्मान भी नहीं करते। विद्यार्थी और शिक्षक के संबंध पहले जितने गहरे मूल्य आधारित थे अब उतने नहीं रहे और आजकल यह ज्यादातर स्वार्थपरक स्वरूप ले चुके हैं। अतः आवश्यकता है इसे पहले की तरह भौतिकवाद से ऊपर उठाकर पुनः विश्वास, मूल्य और आत्मीयता पर आधारित बनाया जाए।

Eletter 04 - विधवाओं की स्वतंत्रता

 आज से करीबन 200 वर्ष पूर्व 1825 में राजा राम मोहन रॉय ने ब्रिटिश गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक की मदद से सती प्रथा के खिलाफ मुहीम चलाया था. परंतु विडंबना यह है कि सती तो चला गया परंतु विधवाओं के प्रति बुरी नजर, दुराचार, आज भी कायम है उन्हें ना तो कुछ खाने-पीने या मनपसंद कपड़े पहनने की आजादी है ना ही हंसते बोलने की या कहीं बाहर जाने की और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा शोषण करने वाली स्वयं महिलाएं ही हैं. रीति रिवाज को ढाल बनाकर विधवाओं के प्रति कुदृष्टि रखी जाती है और उनकी मुश्किल वक्त को और भी दुष्कर बनाया जाता है. सवाल यह है कि क्या हम सब जागरूक लोग दूसरे राजा राम मोहन रॉय के इंतजार में बैठे रहे या स्वयं मshal उठाकर विधवाओं के साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएं.

Eletter 03 - औरतौं की दोहरी बोझ.

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  आज के दिन महिलाएं पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है, परंतु देखा जा रहा है कि महिलाओं पर नौकरी और घर का काम असंतुलित बनता जा रहा है. NSSO के अनुसार महिलाएं हर दिन औसतन 5.5 घंटे काम करती हैं और पुरुष केवल 30 मिनट. इससे महिलाओं में मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ रही है. यदि पुरुष भी घरेलू कार्य में सहभागी बने तो यह बोझ साझा होगा. बेटियों को पढ़ाने के साथ-साथ कामकाजी बहुओं को संतुलन दिलाना भी जरूरी है, तभी परिवार और देश दोनों आगे बढ़ सकेंगे.

Eletter 02 - अस्पताल का खर्च

  कुछ दिन पहले एक अपने ने आईसीयू में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। अस्पताल की औपचारिकताएँ और डिस्चार्ज की प्रक्रिया पूरी होने में समय लगा और — हमें वहाँ घंटों इंतज़ार करना पड़ा।  ऐसे क्षणों में परिवार केवल भावनात्मक नहीं, आर्थिक रूप से भी पूरी तरह टूट जाता है। इलाज हो जाए तो संतोष की बात है, पर यदि प्रियजन को बचाया न जा सके — तब भी पूरा भुगतान करना पड़ता है जो बेहद पीड़ादायक अनुभव होता है। नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (NHA) 2019-20 के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 55% स्वास्थ्य खर्च लोग अपनी जेब से करते हैं। अक्सर अस्पताल का बिल लाखों में पहुँच जाता है, और मरीज़ के जाने के बाद वह खर्च बोझ बन जाता है। इसमें परिवार को कोई राहत नहीं मिलती — न मानसिक रूप से, न आर्थिक रूप से। इसलिए ज़रूरत है कि सरकारी व्यवस्था और निजी अस्पतालों की जवाबदेही तय हो। निजी अस्पताल के मनमाने खर्च पर सरकार को अंकुश लगाना अनिवार्य है. कम से कम ऐसे मामलों में जहाँ मरीज़ को बचाया नहीं जा सका, वहाँ पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए।

Eletter 01- बारिश की बूंदें और शहरी अव्यवस्था

  बीते दिनों रांची समेत झारखंड के अधिकांश जिलों में अच्छी वर्षा देखने को मिली है। इससे न केवल वातावरण ठंडा हो गया है बल्कि किसानों के चेहरे पर भी मुस्कान लौट आई है। हालांकि दूसरी ओर, शहरों में कीचड़, ट्रैफिक जाम, सड़कों पर जलजमाव जैसी समस्याएँ आम हो गई हैं। अर्थात यह जरूरी है कि नगर निगम एवं संबंधित विभाग सतर्क हो और योजनाबध्द तरीके से विकास पर  ध्यान दें.   आवश्यकता है कि जल आपूर्ति हेतु वर्षा जल का संचयन किया जाए, साथ ही डेंगू, मलेरिया, हैजा, टाइफाइड जैसी बीमारियों से बचाव के उपाय भी किए जाएँ ताकि वातावरण शुद्ध एवं स्वस्थ बना रहे ।अन्यथा वषा वरदान न बनकर आपदा बन जाएगी ।