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A Stormy Voyage

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 You have set on a dangerous voyage,  full of storms and snow and you ask yourself, “Why do I feel alone?” The earth sleeps in luxury,  and you beg for earth; you have set on a dangerous voyage, full of storms and snow. The storms seem tough enough for no one to face,  but ones who face the storm,  become tougher than the storm itself. No one supports an ailing enterprise,  and a person fighting a tiger,  but he who supports himself becomes a tiger. The poet  dares to face the storms and snow,  for he himself is wiser  to tackle it on his own! He finally sets on to walk alone, fearing no one, but, yes, his own things seem tough to him but he shall resolve them on his own. --------------------- 30/11/2023

E-letter 12 - सफाई हमारी जिम्मेदारी।

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  भारत की रेल में सफाई की बहुत निंदा की जाती है परंतु क्या कोई रेलगाड़ी शुरू से ही गंदी गंदगी से भरी रहती है? रेलगाड़ी स्टेशन से स्वच्छ और साफ सुथरी निकलती है परन्तु यात्रीगण पान की पिक अखबार, रैपर और बाथरूम का अनुचित इस्तेमाल करते हैं और कूड़ा फैला देते हैं। यह हम यात्रियों की जिम्मेदारी बनती है कि हम रेल,बस या मेट्रो में सफर करते वक्त अपनी जिम्मेदारी समझ कर सफाई करें और स्वच्छता बरकरार रखें।

E-letter 11 - शादी या सामाजिक दबाव?

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  आज के समय में शादियाँ परंपरा से अधिक दिखावे और व्यवसाय का माध्यम बनती जा रही हैं। भोजन, परिधान, वेन्यू और प्री-वेडिंग शूट तक सब कुछ खर्च और प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन गया है। पहले जहाँ परिवारजन मिलकर सादगी से आयोजन करते थे, वहीं अब महंगे इंतज़ामों पर ज़ोर है. ऐसे में मध्यम वर्गीय परिवार लाखों के लोन के बोझ तले दब जा रहे हैं ताकि वे अपनी संतान की शादी के आयोजन में कोई कमी न रह जाए और समाज की कसौटी पर खरे उतर पाएं, भले ही शादी के बाद परिवार भारी कर्ज में ही क्यों न डूब जाए। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमें चाहिए कि विवाह के मूल संस्कार, सादगी और गरिमा को बनाए रखें, ताकि परंपराओं पर पैसे का प्रभाव हावी न हो।

खूंटे से चौखट तक

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Disclaimer - Inspired by true stories of women who are still chained in the name of traditions and by the unwritten rules of society about what “bade ghar ki bahu-betiyan” should or should not do. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ मौसम सुहाना हो चला था। बिन मौसम बरसात के बाद गीली मिट्टी की खुशबू हवा में घुली हुई थी। बालों को लहराती हवा और कानों में पड़ती पत्तों की सरसराहट के बीच मैं अपनी चौखट पर कुर्सी लगाए बैठी थी। तभी नज़र पास के चाचा की गौशाला पर पड़ी। एक गाय अपने खूंटे को बार-बार तोड़ने का प्रयास कर रही थी। मानो इस खूबसूरत शाम में वह भी मेरी तरह झूमना चाहती हो; दूर-दूर तक फैले खलिहानों में दौड़ना चाहती हो; अपनी पूंछ उछालकर खुली हवा को महसूस करना चाहती हो। उस पल अहसास हुआ कि कोई फर्क नहीं था उस गाय में और मुझमें। वह बंधी थी महज़ एक खूंटे से, और मैं अपने कुल की मर्यादा, लोक-लिहाज़ और उस झूठी शानो-शौकत से, जो शायद मेरे पांव चौखट से बाहर निकलते ही टूट जाती। आंखों में आए आंसू पोंछते हुए मैं कुर्सी से उठी और घर के भीतर चली गई। बाहर खेत-खलिहान, मिट्टी की खुशबू और खुली हवा मुझे पुकार...

The Art of Ignorance

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  Recently I started to breathe...nhi mai saans pehle bhi le rahi thi....par jobless aur " kunwari tezi se budhi hoti huyi ladki ko settle karo ", " Abhi tak clear nhi hua?" "Nukari nhi chhodni chahiye thi!" wale taano ne suffocate kar rakha tha!  But by the grace of God, sorry, by the grace of government, I secured a job which made me a little mentally stable to absorb all the taunts of society. Taunts ab bhi hain....par level badal gaya hai. Now people taunt me .... that " Rank thoda aur achha rehta toh promotion achhi jaldi hoti; cdpo hi toh hai....kaun sa upsc clear ki hai....; Itni  hi tez thi toh yahi exam clear kar payi....tyaari toh upsc ki kar rahi thi. .."  Kuch over-concerned relatives ke sujhav bhi mil rahe ki " aur aage jaana hai "....iss baat se jo pressure create hota hai mere "komal mann" par shayad hi unko maloom ho!  Kuch relatives ke mumma papa ko taunt-calls bhi aane band ho gaye;  Ab vo khud apne issues pa...

Eletter 10- युद्ध और मानवता

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  मध्य एशिया में दिनोंदिन बढ़ती युद्ध के हालात के कारण तबाही मानवता की हो रही है। इससे ना सिर्फ तेल के दाम में वृद्धि हो रही है, बल्कि बच्चे, महिलाएँ, आम जन पर भी असर हो रहा है। दिव्तीय विश्व युद्ध से शायद हमने कुछ नहीं सीखा, शायद इसलिए भयानक मिसाइल से देश आपस में लड रहे हैं। यह शताब्दी हमें जलवायु परिवर्तन से लड़‌ना चाहिए था तो हम युद्ध से आर्थिक तबाही की ओर अग्रसर हो रहे हैं। आज ज़रूरत है तो संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य देशों की हस्तक्षेप की ताकि युद्ध रोक सके और तबाही होने से बचा सके।

Eletter 09 - मोबाइल फोन की अनियंत्रित उप‌योग की रोकथाम

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  किशोरों में बढ़ते अवसाद को रचनात्मक ढंग से रोकने की ज़रूरत है. पहला, माता-पिता, भाई-बहन से संवाद बढायें. बच्चे मोबाइल फोन का उपयोग इसलिए ही करते हैं, क्योंकि संवाद से वे कट जाते हैं; माता पिता से भावनात्मक दूरी बढ़ जाती है. उन्हें बात-बात पर डॉट - फटकार किया जाता है. शाबाशी की जगह तानों का भी डर होता है; इसलिए जरूरी है कि अभिभावक दोस्त बन कर बिना तुलना किये बच्चों के साथ वक्त बितायें. बच्चों की पसंद- नापसंद समझें और उन्हें स्वीकार करें. बच्चों को खाली समय में पार्क, धार्मिक स्थल सैर कराने ले जाए. इससे बच्चे मोबाइल की दुनिया से ख़ुद ही बाहर निकले पाएँगे ।

Eletter 08 - अभिभावक बच्चों की हमेशा आलोचना न करें:-

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  हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है कि जो अभिभावक बच्चों पर अत्यधिक दबाव और पाबंदी बनाकर रखते हैं, उनके बच्चों में विचार-शक्ति कम हो जाती है और उनका आत्मविश्वास घटने लगता है. किशोरावस्था में वे आक्रामक भी हो जाते हैं और अभिभावकों से दूरी बना लेते हैं. वे अपने माता-पिता से छोटी-छोटी बातें भी साझा करने से डरने लगते हैं. अतः अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को समझें, उनसे बातें साझा करें और किसी भी बात पर हमेशा उनकी आलोचना न करें. उनका मनोबल बढ़ाएँ और उनका विश्वास जीतें, तभी एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढा जा सकता है. 

Eletter 07 - रिश्तों का व्यापार

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  व्यवसायीकरण और औद्योगीकरण ने समाज की सोच और मूल्यों को गहराई से प्रभावित किया है। आज आर्थिक स्थिति व्यक्ति की पहचान का प्रमुख आधार बन चुकी है। रिश्ते, विवाह और सामाजिक सम्मान भी अब आर्थिक सामर्थ्य के आधार पर तय होते हैं। इससे मानवीय संवेदनाएँ और सहानुभूति पीछे छूटती जा रही हैं। व्यवसायीकरण ने जहाँ जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं संबंधों को औपचारिक और स्वार्थपूर्ण भी किया है। सच्चा विकास तभी संभव है जब आर्थिक प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों का भी संरक्षण हो। 

Eletter 06- राज्य में प्रतियोगी परिक्षाओं की विडंबना

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  कहते हैं, समय सबसे मूल्यवान होता है। परंतु हमारे राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं में न तो परीक्षाएं समय पर होती हैं, न ही उनका परिणाम निर्धारित कैलेंडर के अनुसार आता है। साल-दर-साल बीत जाते हैं, लेकिन परिणाम का कोई संकेत नहीं मिलता। इससे न केवल सरकार की लापरवाही उजागर होती है, बल्कि विद्यार्थियों का अनमोल समय भी व्यर्थ चला जाता है। सरकार को चाहिए कि वह अपने तय समय-सारणी के अनुसार परीक्षाओं का आयोजन सुनिश्चित करे, ताकि युवाओं का समय और विश्वास दोनों सुरक्षित रहें। तभी सच्चे अर्थों में राज्य का  विकास संभव होगा; अन्यथा पूरा युवा समाज अंधकार में भटकता रहेगा।

Eletter 05 - आधुनिक युग में शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों की चुनौतियां.

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शिक्षक समाज के वह नींव होते हैं जिन पर बच्चों का व्यक्तित्व एवं आचरण निर्भर करता है। वे हमें किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। एक अच्छा शिक्षक समाज के कल्याण में विशेष भूमिका निभाता है, परंतु आज गूगल बाबा और chatgpt के दौर में विद्यार्थी शिक्षक के संबंध की नींव हिल चुकी है। विद्यार्थी अपने शिक्षकों को कमतर आँकते हैं और उनका सम्मान भी नहीं करते। विद्यार्थी और शिक्षक के संबंध पहले जितने गहरे मूल्य आधारित थे अब उतने नहीं रहे और आजकल यह ज्यादातर स्वार्थपरक स्वरूप ले चुके हैं। अतः आवश्यकता है इसे पहले की तरह भौतिकवाद से ऊपर उठाकर पुनः विश्वास, मूल्य और आत्मीयता पर आधारित बनाया जाए।

Eletter 04 - विधवाओं की स्वतंत्रता

 आज से करीबन 200 वर्ष पूर्व 1825 में राजा राम मोहन रॉय ने ब्रिटिश गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक की मदद से सती प्रथा के खिलाफ मुहीम चलाया था. परंतु विडंबना यह है कि सती तो चला गया परंतु विधवाओं के प्रति बुरी नजर, दुराचार, आज भी कायम है उन्हें ना तो कुछ खाने-पीने या मनपसंद कपड़े पहनने की आजादी है ना ही हंसते बोलने की या कहीं बाहर जाने की और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा शोषण करने वाली स्वयं महिलाएं ही हैं. रीति रिवाज को ढाल बनाकर विधवाओं के प्रति कुदृष्टि रखी जाती है और उनकी मुश्किल वक्त को और भी दुष्कर बनाया जाता है. सवाल यह है कि क्या हम सब जागरूक लोग दूसरे राजा राम मोहन रॉय के इंतजार में बैठे रहे या स्वयं मshal उठाकर विधवाओं के साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएं.

Eletter 03 - औरतौं की दोहरी बोझ.

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  आज के दिन महिलाएं पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है, परंतु देखा जा रहा है कि महिलाओं पर नौकरी और घर का काम असंतुलित बनता जा रहा है. NSSO के अनुसार महिलाएं हर दिन औसतन 5.5 घंटे काम करती हैं और पुरुष केवल 30 मिनट. इससे महिलाओं में मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ रही है. यदि पुरुष भी घरेलू कार्य में सहभागी बने तो यह बोझ साझा होगा. बेटियों को पढ़ाने के साथ-साथ कामकाजी बहुओं को संतुलन दिलाना भी जरूरी है, तभी परिवार और देश दोनों आगे बढ़ सकेंगे.

Eletter 02 - अस्पताल का खर्च

  कुछ दिन पहले एक अपने ने आईसीयू में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। अस्पताल की औपचारिकताएँ और डिस्चार्ज की प्रक्रिया पूरी होने में समय लगा और — हमें वहाँ घंटों इंतज़ार करना पड़ा।  ऐसे क्षणों में परिवार केवल भावनात्मक नहीं, आर्थिक रूप से भी पूरी तरह टूट जाता है। इलाज हो जाए तो संतोष की बात है, पर यदि प्रियजन को बचाया न जा सके — तब भी पूरा भुगतान करना पड़ता है जो बेहद पीड़ादायक अनुभव होता है। नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (NHA) 2019-20 के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 55% स्वास्थ्य खर्च लोग अपनी जेब से करते हैं। अक्सर अस्पताल का बिल लाखों में पहुँच जाता है, और मरीज़ के जाने के बाद वह खर्च बोझ बन जाता है। इसमें परिवार को कोई राहत नहीं मिलती — न मानसिक रूप से, न आर्थिक रूप से। इसलिए ज़रूरत है कि सरकारी व्यवस्था और निजी अस्पतालों की जवाबदेही तय हो। निजी अस्पताल के मनमाने खर्च पर सरकार को अंकुश लगाना अनिवार्य है. कम से कम ऐसे मामलों में जहाँ मरीज़ को बचाया नहीं जा सका, वहाँ पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए।

Eletter 01- बारिश की बूंदें और शहरी अव्यवस्था

  बीते दिनों रांची समेत झारखंड के अधिकांश जिलों में अच्छी वर्षा देखने को मिली है। इससे न केवल वातावरण ठंडा हो गया है बल्कि किसानों के चेहरे पर भी मुस्कान लौट आई है। हालांकि दूसरी ओर, शहरों में कीचड़, ट्रैफिक जाम, सड़कों पर जलजमाव जैसी समस्याएँ आम हो गई हैं। अर्थात यह जरूरी है कि नगर निगम एवं संबंधित विभाग सतर्क हो और योजनाबध्द तरीके से विकास पर  ध्यान दें.   आवश्यकता है कि जल आपूर्ति हेतु वर्षा जल का संचयन किया जाए, साथ ही डेंगू, मलेरिया, हैजा, टाइफाइड जैसी बीमारियों से बचाव के उपाय भी किए जाएँ ताकि वातावरण शुद्ध एवं स्वस्थ बना रहे ।अन्यथा वषा वरदान न बनकर आपदा बन जाएगी ।

Thoughts!

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  Disclaimer : Very few people could connect with what I have penned down today. Well, if you can't, congratulations! If you do, best of luck!  Few hours  to enter into another quarter of the century. Yet, few people are reluctant to change. They have closed windows of their "wise" brain.  They embrace "modernity" of 2050 "Elon" era. And on the other hand, their feet is stuck in the mud of 1050 CE.  Due to constitution, they have lost the power to control land and "rule" over people.  Only women are left to be "controlled" by them, whom they control, physically, mentally and financially, and if they see  their dominance fading away, they are frustrated, some go wild and the rest are pushed into depression.  I feel pity on their dominating power. I wish they could actually "control" something bigger like the tariff, get U.S. President a Nobel Peace or solve the never ending Kashmir issue, they chose, but women- docile, subs...

Failure!

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 I often wondered how a failure felt on the day of PTM. Well I never knew but today tried to pen it down. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ She didn't want to show her face to anybody. Hidden from people,  even those who didn't know her. She broke all the mirrors in her room, to avoid the reflection of her failed self. Shut herself in her room, With bolted doors and windows; Let the sunshine not enter her room... Lest it would blind her. Her ears could listen her "praise" from relatives,  And the stress in the relatives' voice saying ,   'its her perfect age to get "settled"'!  Her body shivered, tears poured over her charred rosy cheeks,  She wept over her shattered life,  For she failed to collect and complete her jigsaw puzzle;  Comparison was her everyday phenomena, Routine was to sit and gaze books,  In which she couldn't trust now. But still as she was habituated,  Turned the pages.  The weight of the book felt heav...

प्रकृति और सांस्कृति का अटूट संगम – हमारा झारखंड

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     बीते दिनों नवादा जिले से कोडरमा घाटी की यात्रा कर रही थी, प्यारी सी हवा चेहरे को छुई जा रही थी. हाईवे से अलग होकर सड़कें सरकरी हो गई, गाड़ी की गति धीमी और धूप जंगल की चादर को चीर नहीं पा रही थी. दूर-दूर तक घने जंगल और पेड़ के पत्तों पर चमक, पक्षियों की सरसराहट, मुंह से निकल गया - यही तो है हमारा झारखंड. झाड़ियां के प्रदेश से विख्यात झारखंड प्राचीन काल से ही प्रकृति की गोद में रहा है. यहां की लकड़ी, लौह, जानवर इत्यादि मौर्य - नंद इत्यादि मगध राजवंशों के राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ को पूरा करते थे.              झारखंड के प्रकृति को सहेज के रखती है उसकी संस्कृति. यहां प्रकृति और संस्कृति दोनों इतनी गहराई से एक दूसरे से जुड़ी हुईं हैं कि दोनों को अलग करके समझा नहीं जा सकता . यहां की नदियां, वन , पहाड़ , झरने केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं है बल्कि लोगों की जीवनशैली, परंपरा और अटूट आस्था का केंद्र है. यहां के जल-जंगल-जमीन आदिवासी समुदाय की आत्मा है, जिन्होंने सदियों से प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर रखे हुए हैं.         ...

I am a Human!

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Recently, I met a relative whose blessings I sought. As I bent down to touch his feet, he stopped me. “You’re Lakshmi,” he said, “girls don’t touch feet.” At sixteen, I might have smiled with pride at being called a goddess. But at twenty-four, I felt nothing divine—just weary. I touched his feet anyway, reluctantly.  Conversely, I’m not Lakshmi. I’m a human. Neither Saraswati nor Kāli. I am living in a society that first deifies women and then subjects them to prejudice every single day.Be it domestic violence, verbal violence, clipping her feathers, and such like. It’s strange how easily we have been accepting this contradiction. A girl is raped at midnight, and instead of defending her, an “honourable” leader remarks that girls shouldn’t be roaming at such hours. But isn’t Goddess Kāli worshipped at midnight? Lakshmi—the word itself has become synonymous with dowry. A girl is called Lakshmi because she carries gold and jewellery(and much more) to her in-laws’ house. Yet when ...

INSIDE

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  I was sitting at the terrace and and enjoying a cup of tea in the evening, when I thought arrived. A thought out of nowhere, in my meloncholic mind adding more to the gloominess. There were 23 boys, adolscents and teenagers playing in the field but my eyes searched for at least three girls in the four directions -  playing,  gossiping,  walking , and could find none. It's not that my locality has no girls. There are at least one in every household ( for want of a son, of course) but none of them were out of their home, typically, because girls, my bad, "good girls",  are not supported to play in the fields like boys. There is no doubt that why unlike boys, girls made only handful in the recent Olympics.   They're supposed to be inside. Girls hardly are seen out playing Cricket or football. When I was a kid. I searched other girls and kids to play with me badminton, but either they were busy with utensils or assisting their mums in cooking. Sadly, aft...