खूंटे से चौखट तक



Disclaimer- Inspired by true stories of women who are still chained in the name of traditions and by the unwritten rules of society about what “bade ghar ki bahu-betiyan” should or should not do.

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मौसम सुहाना हो चला था। बिन मौसम बरसात के बाद गीली मिट्टी की खुशबू हवा में घुली हुई थी। बालों को लहराती हवा और कानों में पड़ती पत्तों की सरसराहट के बीच मैं अपनी चौखट पर कुर्सी लगाए बैठी थी।

तभी नज़र पास के चाचा की गौशाला पर पड़ी। एक गाय अपने खूंटे को बार-बार तोड़ने का प्रयास कर रही थी। मानो इस खूबसूरत शाम में वह भी मेरी तरह झूमना चाहती हो; दूर-दूर तक फैले खलिहानों में दौड़ना चाहती हो; अपनी पूंछ उछालकर खुली हवा को महसूस करना चाहती हो।

उस पल अहसास हुआ कि कोई फर्क नहीं था उस गाय में और मुझमें।

वह बंधी थी महज़ एक खूंटे से, और मैं अपने कुल की मर्यादा, लोक-लिहाज़ और उस झूठी शानो-शौकत से, जो शायद मेरे पांव चौखट से बाहर निकलते ही टूट जाती।

आंखों में आए आंसू पोंछते हुए मैं कुर्सी से उठी और घर के भीतर चली गई। बाहर खेत-खलिहान, मिट्टी की खुशबू और खुली हवा मुझे पुकार रहे थे; और भीतर, मेरी चौखट मुझे फिर से बांध रही थी।


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